
अजीत मिश्रा (खोजी)
माझा खुर्द में ‘खनन माफिया’ बनाम ग्रामीण: अवैध खुदाई से मिट रहा गांवों का वजूद, प्रशासन बना ‘मूकदर्शक’
- खनन विभाग-माफिया का ‘गठजोड़’ या प्रशासनिक नाकामी? ग्रामीणों की जमीन पर कब्ज़ा, अधिकारी बने मूकदर्शक!
- बस्ती: अवैध खनन से मिट रही गांव की पहचान, DM कृतिका ज्योत्सना के लिए बनी सबसे बड़ी चुनौती!
- दिन-दहाड़े ‘लूट’ और रात को ‘तांडव’: नियम-कानून को ठेंगा दिखाकर सरयू को खोखला कर रहे खनन माफिया!
बस्ती/कलवारी: जनपद के कलवारी थाना क्षेत्र अंतर्गत माझा खुर्द और माझा कला तीलियावा का इलाका इन दिनों ‘कानून के जंगलराज’ का केंद्र बना हुआ है। सरयू नदी के किनारे स्थित इन गांवों में खनन माफियाओं ने प्रशासनिक संरक्षण और अपनी दबंगई के दम पर तबाही मचा रखी है। आलम यह है कि माफिया अब केवल सरकारी पट्टे की जमीन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्रामीणों की निजी खेती की जमीनों पर भी कब्जा कर उसे खोखला कर रहे हैं।जनपद के कलवारी थाना क्षेत्र स्थित माझा कला तीलियावा और माझा खुर्द इलाके में इस समय ‘अंधेर नगरी, चौपट राज’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। सरयू की गोद को छलनी कर रहे खनन माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब वे ग्रामीणों की निजी जमीन पर भी जबरन कब्जा कर खनन कर रहे हैं। प्रशासन और खनन विभाग की संदिग्ध चुप्पी ने इसे एक गंभीर संकट बना दिया है।
’सरकारी पट्टा’ या ‘मौत का परवाना’?
दिनेश यादव, जो इस पूरे खेल के मुख्य भुक्तभोगी हैं, का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने साक्ष्यों के साथ बताया कि उनका परिवार अपनी पुस्तैनी जमीन पर खेती कर जीवनयापन करता है। लेकिन पिछले कुछ समय से खनन माफिया दिवाकर सोनकर के गुर्गों ने बिना किसी अनुमति या मुआवजे के उनकी जमीन (गाटा संख्या 861 एवं 870) में जेसीबी डालकर बालू निकालना शुरू कर दिया है।
दिनेश का दावा है कि पट्टा गाटा संख्या 1164/33 एवं 1164/51 के लिए स्वीकृत है, लेकिन माफिया अपनी पहुंच के दम पर गाटा संख्या 1164/71 में अवैध खनन कर रहे हैं। जब पीड़ित ने इसका विरोध किया, तो उन्हें धमकाया गया। थाना कलवारी में शिकायत करने के बाद पुलिस ने ‘पैमाइश तक खुदाई बंद’ रहने का आश्वासन दिया था, लेकिन वह आश्वासन महज एक औपचारिक खानापूर्ति साबित हुआ। अगले ही दिन वहां भारी मशीनों का काफिला फिर से गर्जना करने लगा।
कानून को ठेंगा, माफिया की हुकूमत
स्थानीय लोगों के अनुसार, शाम ढलते ही प्रतिबंधित मशीनों की गूंज सुनाई देने लगती है। रात भर दौड़ते ओवरलोडेड डंपर और तेज रफ्तार ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से न केवल रास्ते टूट रहे हैं, बल्कि आए दिन सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। यह खनन केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि ग्रामीणों के अस्तित्व के लिए मौत का परवाना बन गया है। माझा खुर्द के ग्रामीणों का आरोप है कि यहां खनन माफियाओं ने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ एक मजबूत ‘गठजोड़’ बना लिया है।
- अधिकारियों की चुप्पी: जिला खनन अधिकारी प्रशांत यादव पर लग रहे आरोप बेहद गंभीर हैं। ग्रामीणों का दावा है कि जब वे शिकायत लेकर जाते हैं, तो या तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है या उनके नंबर तक ब्लॉक कर दिए जाते हैं।
- रात का सन्नाटा और मशीनों का शोर: नियमतः खनन केवल दिन में और तय मात्रा में होना चाहिए, लेकिन यहां शाम ढलते ही प्रतिबंधित पोकलैंड मशीनें और ओवरलोडेड डंपरों का तांडव शुरू हो जाता है।
- पर्यावरण के लिए खतरा: सरयू नदी की कोख को दिनों-रात छननी किया जा रहा है। नदी के किनारों पर की जा रही इस अंधाधुंध खुदाई से आने वाले मानसून में गांव के कटान का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
हर साल पानी में विलीन हो रही सैकड़ों एकड़ जमीन
खनन माफियाओं की यह मनमानी केवल आज का मुद्दा नहीं है। हर साल सैकड़ों एकड़ उपजाऊ कृषि योग्य जमीन सरयू की धारा में विलीन हो रही है, जिसका सीधा कारण नदी के किनारों पर हो रही अवैध खुदाई है। ग्रामीणों का आरोप है कि माफियाओं को मालूम है कि गलत तरीके से जारी किए गए इन पट्टों की उम्र कम है, इसलिए वे कम समय में अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में गांव के भविष्य को ही दांव पर लगा रहे हैं।माझा खुर्द में अवैध खनन से क्षेत्र में बाढ़ का खतरा और भी गंभीर हो गया है। जानकारों का कहना है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में खनन करना घोर अपराध है, फिर भी ये माफिया बार-बार सक्रिय कैसे हो जाते हैं? गांव के प्रधान और दर्जनों ग्रामीणों की शिकायत के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई न होना प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
डीएम के सामने सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा
अब देखना यह है कि जिले की तेजतर्रार डीएम कृतिका ज्योत्सना क्या इस ‘खनन माफिया तंत्र’ को तोड़ पाएंगी? क्या अवैध पट्टों को निरस्त कर ग्रामीणों की जमीन और उनके गांवों को कटान से बचाया जाएगा, या फिर माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों का यह गठजोड़ इसी तरह आम जनता का हक मारता रहेगा?जिलाधिकारी कृतिका ज्योत्सना अपनी सख्त कार्यशैली के लिए जानी जाती हैं। अब माझा खुर्द के ग्रामीणों की नजरें उन पर टिकी हैं। सवाल यह है कि:
- क्या गलत तरीके से जारी पट्टों को तत्काल निरस्त किया जाएगा?
- क्या खनन अधिकारी और माफिया के उस ‘गठजोड़’ की जांच होगी, जो शिकायतकर्ताओं को दुश्मन समझ रहा है?
- क्या प्रशासन अपनी नाक के नीचे हो रहे इस पर्यावरणीय और राजस्व अपराध पर नकेल कस पाएगा?
क्या बिक चुका है खनन विभाग?
सवाल उठ रहे हैं कि जिला खनन अधिकारी प्रशांत यादव की भूमिका क्या है? आरोप है कि खनन अधिकारी शिकायतकर्ताओं के नंबर तक ब्लॉक कर रहे हैं और माफियाओं को खुली छूट दे रखी है। आखिर खनन माफियाओं को किसका संरक्षण प्राप्त है? क्यों राजस्व और पर्यावरण को हो रहे इस भारी नुकसान पर स्थानीय प्रशासन के हाथ कांप रहे हैं?
ग्रामीण अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। यदि समय रहते जिला प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो माझा खुर्द का नक्शा आने वाले दिनों में बदल सकता है और शायद आने वाली पीढ़ी इस गांव को केवल यादों में ही देख पाएगी।
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

















